हनुमान जी लंका दहन और सीता खोज
जब हनुमान समुद्र पार करके लंका पहुँचे, तो उनका मुख्य उद्देश्य था माता सीता का पता लगाना। वे छोटे रूप (सूक्ष्म रूप) में पूरी लंका में घूमते रहे—महलों, बागों और राक्षसों के घरों में खोज की, लेकिन सीता जी कहीं दिखाई नहीं दीं।
अंत में वे अशोक वाटिका पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक वृक्ष के नीचे माता सीता बैठी हैं—दुखी, कमजोर और रावण की धमकियों से घिरी हुई। हनुमान जी ने वृक्ष पर बैठकर राम कथा सुनाई, ताकि सीता जी को विश्वास हो सके कि वे श्रीराम के दूत हैं।
फिर हनुमान जी ने उन्हें श्रीराम की अंगूठी दी। अंगूठी देखकर सीता जी को विश्वास हो गया और वे भावुक हो उठीं। उन्होंने हनुमान जी को अपना संदेश दिया और एक चूड़ामणि (आभूषण) श्रीराम के लिए दे दी।
अब हनुमान जी ने सोचा कि लंका की शक्ति का अंदाज़ा भी लगा लिया जाए। उन्होंने अशोक वाटिका में उत्पात मचाना शुरू कर दिया—पेड़ उखाड़े, राक्षसों को परास्त किया। इससे क्रोधित होकर रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजा, लेकिन हनुमान जी ने उसे भी मार दिया।
अंततः मेघनाद (इंद्रजीत) ने ब्रह्मास्त्र का उपयोग कर हनुमान जी को बाँध लिया। हनुमान जी जानते थे कि यह ब्रह्मास्त्र का सम्मान है, इसलिए वे बंधे रहे और उन्हें रावण के दरबार में ले जाया गया।
दरबार में हनुमान जी ने रावण को समझाया कि वह सीता जी को श्रीराम को लौटा दे, लेकिन रावण ने क्रोध में आकर उनकी पूँछ में आग लगाने का आदेश दे दिया।
राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ में कपड़े बाँधकर आग लगा दी। तब हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और पूरी लंका में कूद-कूदकर आग लगा दी। महल, भवन, सोने की लंका—सब जलने लगे।
यह घटना “लंका दहन” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
अंत में हनुमान जी समुद्र किनारे पहुँचे, अपनी पूँछ की आग बुझाई और फिर श्रीराम के पास लौटकर पूरी कथा सुनाई—सीता जी का समाचार दिया और उनका दिया हुआ चूड़ामणि प्रस्तुत किया।
इस प्रकार हनुमान जी ने:
- सीता जी की खोज पूरी की
- रावण को चेतावनी दी
- और लंका की शक्ति का भी अंदाज़ा लगा लिया